गजनी

आमिर खान की ‘गजनी’ एक अच्छी फ़िल्म है, इसमें तो कोई शक नहीं है| आमिर नें हर बार की तरह जबरदस्त एक्टिंग की है। उनके चेहरे पर गुस्से और दर्द के वो भाव बिलकुल असली लगते हैं।

लेकिन डायरैक्टर नें इसमें दक्षिण भारतीय फ़िलमों की पूरी छाप छोड़ी है। बात चाहे हीरो को आप्रकिर्तिक शक्तीशाली बनाने की हॊ या हिरोइन को चुलबुली ऒर रंगीन दिखाने की, इसमें पूरा दक्षिण भारतीय मसाला भरा पड़ा है्। आमिर खान नें दुशमनों को ऎसे हवा में उठा-उठा के पटका है कि भौतिकि के नियम चकनाचूर हो गए हैं और ज़िया खान नें कालेज में ऎसी स्टेज पर वैसा डांस किया है कि किसी फ़िलमी अवार्ड समारोह में भी न हो । हांलाकि यह बालीवुड के लिए कोई नई बात नहीं है, पर मुझे लगा था कि आमिर ने यह सब छोड़ दिया है।

फ़िल्म के पहले ही सीन में एक डाक्टर मैडिकल कालेज की छात्राओं को बताता है कि ‘दिमाग़ शरीर का सबसे महत्तवपूर्ण अंग है। लड़कीयां यह कापी पर लिखती भी हैं, जो की हैरानी की बात है। क्या उन्हें अभी तक यह भी पता नहीं था?

फ़िल्म में विलेन ‘आईफोन’ के इस्तमाल में उलझे हुए थे। कोई तो उसे आम फ़ोन की तरह बटन दबा के काल सुन रहा था (जो कि मुमकिन नहीं है) तो कोई उलटे फ़ोन पर ही बात करता दिखाई दिया।

“Short Term Memory Loss” के बाद तो आमिर को सिर्फ़ नई चीज़ें सीखने में मुशकिल आनी चाहिए थी और पुरानी यादें बनी रहनी चाहिए थीं। पर वो तो अपने मैनेजर तक को भूल गया था, यह तो “Long Term Memory Loss” हो गया….हेहे। भारतीय फ़िल्मकार रिसर्च करने में अभी भी विश्वास नहीं करते।

इस फ़िल्म से एक फ़ायदा तो ज़रूर होगा कि भारत के ‘मर्द’ अपने पेट को अंदर करने की सोचने लगेंगे……..सरफ़रोश फ़िल्म में जो विलन थे वो तो गजनी तक आते-आते बूड़े हो गये हैं लेकिन हीरो आमिर तो और जवान दिख रहे हैं।

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